अपने ही किसी साए से टकराया हूँ फिर भी
महसूस ये होता है यहाँ आया हूँ फिर भी
काग़ज़ पे सियाही की तरह फैल रहा हूँ
ये हर्फ़-ए-नदामत नहीं शरमाया हूँ फिर भी
हर-चंद सफ़र दर्द के दरिया का सफ़र था
साहिल के किसी ख़्वाब से घबराया हूँ फिर भी
साग़र में सर-ए-शाम लहू मेरा मिला है
इक नश्शा-ए-बे-नाम में लहराया हूँ फिर भी
हर-चंद किसी जीतने वाले ने सदा दी
हारे हुए लोगों में चला आया हूँ फिर भी
मिलते ही रहे ज़ख़्म मिरी किश्त-ए-बदन को
एहसास के हर फूल का सरमाया हूँ फिर भी
सूरज के मुक़ाबिल था 'ज़फ़र' दश्त-ए-सहर में
मैं प्यास के सहरा में कोई साया हूँ फिर भी
— Ahmad Zafar















