
देख कर हर कोई बेकार समझ ले मुझ को
अपनी उल्फ़त में गिरफ़्तार समझ ले मुझ को
बिना उस के तिरी जन्नत मुझे मंज़ूर नहीं
तू मिरी मान गुनहगार समझ ले मुझ को
— Faiz Ahmad
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