गुलों के रंग उभरे जा रहे हैं
परिंदे और भी चिल्ला रहे हैं
मुहब्बत को सज़ा बतला रहे हैं
ये लड़के इश्क़ से घबरा रहे हैं
मुहब्बत क्या है कोई हम सेे पूछो
दिलों से कूच करके आ रहे हैं
मैं उनकी याद में खोया हुआ हूँ
ग़ज़ल में शे'र बढ़ते जा रहे हैं
जहाँ तर्क-ए-त'अल्लुक़ हो गया था
वो हमको फिर वहीं बुलवा रहे हैं
अभी कल ही तो मिल के आ रहा हूँ
वो मुझ सेे इश्क़ फिर फ़रमा रहे हैं
मैं सब कुछ जान कर नादाँ बना हूँ
वो मुझ को बारहा समझा रहे हैं
मैं उन को देखकर मुस्का रहा हूँ
वो मुझ को देखकर जल जा रहे हैं
मुहब्बत करने की जल्दी थी जिन को
मुहब्बत कर के वो पछता रहे हैं
ग़ज़ल 'राकेश' से सुननी है इनको
मगर ये लोग तो शर्मा रहे हैं
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