कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता
मुझे या रब तेरी दुनिया में कुछ अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे साथ है कोई तो उस का ज़र्फ़ है जानी
वगरना छोड़ जाने में कोई पैसा नहीं लगता
बहुत लड़ते झगड़ते थे मगर अब जान पड़ता है
तुम्हारे बिन मुझे इस शहर में अच्छा नहीं लगता
मुहब्बत चार दिन की थी जवानी चार दिन की है
मगर इस चार दिन में भी किसी को क्या नहीं लगता
ग़ज़ल तहज़ीब जैसी है ये फ़न बारूद जैसा है
कभी मिसरा नहीं लगता कभी नुक़्ता नहीं लगता
मुहब्बत चार दिन की चाँदनी है फिर कहाँ होगी
मगर ऐ बद्र साहब आदमी को क्या नहीं लगता
ये दुनिया किसकी होती है चलो सबको ही जाना है
मगर 'राकेश' माँ बिन घर भी तो पूरा नहीं लगता
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