ये सोचना फ़ुज़ूल है किसपर ग़ज़ल गई
ये दोस्त शाम-ए-ग़म है किसी ओर चल गई
मैं तुम सेे अब भी बोलता हूँ बात तो करो
फिर ये न बोलना कि मेरी जाँ बदल गई
मैं सोचता था लड़कियाँ छाया हैं चाँद की
ये लड़की मेरे सोच से आगे निकल गई
जब तक मुझे ये ज़िंदगी आई समझ में दोस्त
तब तक ये ज़िंदगी नए करवट बदल गई
कब मैं ने सोचा ज़िंदगी इतनी हसीन है
तू आ गया क़रीब तो हसरत मचल गई
जब तुमने मेरी जान मुझे बे-वफ़ा कहा
आँखों के सामने कोई लैला निकल गई
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