चाँद जैसे मुखड़े पर तिल जो काला काला है
मेरे घर के आँगन में सुरमई उजाला है
वज़्म ये सजी कैसी कैसा ये उजाला है
महकी सी फ़ज़ाएँ हैं कौन आने वाला है
मुफ़लिसी से रिश्ता है ग़म से दोस्ती अपनी
मुश्किलों को भी हमने दिल में अपने पाला है
उसकी शोख़ नज़रों ने ज़िंदगी बदल डाली
अब तो मेरे जीवन में हर तरफ़ उजाला है
भूल वो गया मुझको ग़म नहीं रज़ा लेकिन
हमने उसकी यादों को अब तलक सँभाला है
As you were reading Shayari by SALIM RAZA REWA
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