गुलशन में जैसे फूल नहीं ताज़गी नहीं
तेरे बग़ैर ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी नहीं
ये और बात है कि वो मिलते नहीं मगर
किसने कहा कि उन सेे मेरी दोस्ती नहीं
तेरे ही दम से ख़ुशियाँ हैं घर बार में मेरे
होता जो तू नहीं तो ये होती ख़ुशी नहीं
ख़ून-ए-जिगर से मैंने सॅंवारी है हर ग़ज़ल
मेरे सुख़न का रंग कोई काग़ज़ी नहीं
मैं ख़ुद गुनाहगार हूँ अपनी निगाह में
उसके ख़ुलूस-ओ-इश्क़ में कोई कमी नहीं
छू के दरीचा लौट गया मौसम-ए-बहार
लगता है अब नसीब में मेरे ख़ुशी नहीं
तुझ सेे 'रज़ा' के शे'रों में संदल सी है महक
मुमकिन तेरे बग़ैर मेरी शायरी नहीं
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