मुझ सेे वो जान-ए-जानाँ क्या हो गई ख़ता है
जो यक-ब-यक ही मुझ सेे तू हो गया ख़फ़ा है
टूटी हुई हैं शाख़ें मुरझा गई हैं कलियाँ
तेरे बग़ैर दिल का गुलशन उजड़ गया है
आँखें हैं सुर्ख़ रुख़ पर ज़ुल्फ़ें बिखर रही हैं
हिज्र-ए-सनम में शब भर क्या जागता रहा है
तूने तमाम खुशियाँ औरों के नाम कर दीं
तेरी इसी अदा ने दीवाना कर दिया है
फाँसी की हुक़्म देकर ख़्वाहिश वो पूछते हैं
अब क्या उन्हें बताऍं क्या आख़िरी रज़ा है
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