कितना बे-रंग ये ज़माना है
आसमानों में घर बनाना है
मैं ज़मीनों से उठ गया कब का
अब फ़लक मेरा आशियाना है
तेरी उल्फ़त की ओढ़ कर चादर
सारी दुनिया से दूर जाना है
कोई ख़्वाहिश नहीं न कोई ग़म
अपना अंदाज़ सूफ़ियाना है
मुश्किलों से निबाह कर लूँगा
साथ तुझको मगर निभाना है
ग़म फ़क़त ही नहीं है दामन में
चंद ख़ुशियों का भी ख़ज़ाना है
मुझको ख़्वाहिश है उस सेे मिलने की
उसके होंटों पे बस बहाना है
एक दिन ख़्वाब में ही आ जाओ
तुमको फिर से गले लगाना है
दिल ये कहता है तुम चले आओ
आज मौसम बड़ा सुहाना है
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त सँभाले क्यूँ न 'रज़ा'
अपने जीने का ये बहाना है
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