एक सद
में से हर दिन उभरती रही
रोज़ जीती रही रोज़ मरती रही
जिस को पाना ही मुमकिन नहीं था कभी
'उम्र-भर उस को खोने से डरती रही
सीढ़ियाँ कामयाबी की चढ़ते हुए
मैं बहुत से दिलों से उतरती रही
दूसरों को मैं मरहम लगाते हुए
अपने दिल पर लगे ज़ख़्म भरती रही
''इश्क़ करना किसी और का काम था
मैं किसी और का काम करती रही
मुझ को पोशीदा रखनी थी सादा-दिली
सो मैं हुलिए से बनती सँवरती रही
''इश्क़ मुझ को भी होने लगा था मगर
मैं ज़माने के डर से मुकरती रही
''इश्क़ कहने को दोनों तरफ़ था मगर
वो सिमटता गया मैं बिखरती रही
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