तमाम उम्र मैं हर सुब्ह की अज़ान के बाद
इक इम्तिहान से गुज़रा एक इम्तिहान के बाद
ख़ुदा करे कि कहीं और गर्दिश-ए-तक़दीर
किसी का घर न उजाड़े मेरे मकान के बाद
धरा ही क्या है मेरे पास नज़्र करने को
तेरे हुज़ूर मेरी जान मेरी जान के बाद
ये राज़ उस पे खुलेगा जो ख़ुद को पहचाने
कि इक यक़ीन की मंज़िल भी है गुमान के बाद
ये जुर्म कम है कि सच्चाई का भरम रक्खा
सज़ा तो होनी थी मुझ को मेरे बयान के बाद
मेरे ख़ुदा उसे अपनी अमान में रखना
जो बच गया है मेरे खेत में लगान के बाद
Read Full