बग़ीचे में हमीं हैं गा रहे हैं
ये पंछी फिर किसे भरमा रहे है
ख़ुदा हम मान कर तेरी तमन्ना
तिरी दुनिया से तन्हा जा रहे हैं
अभी महकेगा कुछ दिन ये बदन भी
हम उस के गाँव होकर आ रहे हैं
कहा था मौत पर मिलना रहेगा
कफ़न के कोट हम सिलवा रहे हैं
सिपाही हैं अगर इंसान ही तो
हम इनसे जंग क्यूँ लड़वा रहे हैं
कभी जो ज़िन्दगी रस्ते भुला दे
चलो जिस ओर दरिया जा रहे हैं
— SWAPNIL YADAV 'NIL'














