ख़ुदी की शख़्सियत से भागते हो
दिसम्बर की गलन में आग-से हो
नई पाबंदियाँ हैं लो सुनो सब
अगर हो 'इश्क़ तो हमज़ात से हो
सुनाई दे रही है जो अज़ल से
उसी आवाज़ के तुम क़ाफ़िये हो
पता महरूम का इक पूछता हूँ
मिरे में शख़्स था इक जानते हो
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by SWAPNIL YADAV 'NIL'
our suggestion based on SWAPNIL YADAV 'NIL'
As you were reading Wajood Shayari Shayari