ये कभी मुख़्तसर नहीं आती
ज़िन्दगी पर नज़र नहीं आती
आपके याँ ही मौत मुर्दों को
आती होगी इधर नहीं आती
ग़म यही है कि आह अब मेरे
जिस्म को चीर कर नहीं आती
मौत भी दिल दुखायगी मेरा
मौत भी वक़्त पर नहीं आती
तब मुझे चैन ही नहीं पड़ता
तीरगी जब नज़र नहीं आती
वो कोई रेल है कि रौनक है
गुम है, मेरे शहर नहीं आती
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