आसमानों से ज़मीनों को मिलाने वाले
झूटे होते हैं ये तक़दीर बताने वाले
अब तो मर जाता है रिश्ता ही बुरे वक़्तों पर
पहले मर जाते थे रिश्तों को निभाने वाले
जो तेरे 'ऐब बताता है उसे मत खोना
अब कहाँ मिलते हैं आईना दिखाने वाले
बन गया ज़हर मिरी लौ का धुआँ रात गए
सुब्ह उठ्ठे ही नहीं मुझ को बुझाने वाले
तुझ में हिम्मत है तो सूरज के मुक़ाबिल भी आ
मेरे मा'सूम चराग़ों को डराने वाले
अब गया है तो पलट कर मुझे आवाज़ न दे
लौट के मत आ मुझे छोड़ के जाने वाले
पर्दे दरवाज़ों पे आँगन में हसीं चेहरे थे
गाँव में घर हुआ करते थे ख़ज़ाने वाले
As you were reading Shayari by Shakeel Azmi
our suggestion based on Shakeel Azmi
As you were reading undefined Shayari