dilon ka haal jabeen par likha nahin hota | दिलों का हाल जबीं पर लिखा नहीं होता

  - Shakir Dehlvi

दिलों का हाल जबीं पर लिखा नहीं होता
भला जो दिखता है अक्सर भला नहीं होता

ख़ुदा के होते हुए सरकशी का ये आलम
मैं सोचता हूँ कहीं गर ख़ुदा नहीं होता

कभी कभी तो मेरे साथ यूँँ भी होता है
मैं क्यूँँ ख़फ़ा हूँ मुझे ख़ुद पता नहीं होता

हमारी सोच की हद है ख़लाओं से आगे
प तुम से आगे हमें सोचना नहीं होता

वो देखता है मेरी सम्त बस उसी इक पल
जिस एक पल मैं उसे देखता नहीं होता

कुछ ऐसा रब्त है दोनों के दरमियाँ 'शाकिर'
वो दूर होता है मुझ से जुदा नहीं होता

  - Shakir Dehlvi

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