बुरी बातों को दिल पर मत लगाओ

जहाँ तक हो सके बस मुस्कुराओ

उसी पर ग़ौर करना जो है बस में
नहीं पा सकते जो शय भूल जाओ

मिरे अंदर से इक आवाज़ आए
कभी अपनी तरफ़ भी लौट आओ

मैं अपने हाथों से घर को सजा दूँ
तुम अपने हाथ से दीपक जलाओ

अभी दिल को तसल्ली मिल न पाई
ज़रा सा मुस्कुरा कर फिर दिखाओ

बढ़ाओ बाम-ओ-दर की ऐसे रौनक़
दर-ओ-दीवार को जन्नत बनाओ

जो पंछी जा चुके हैं दूर हैं वो
जो पंछी जा रहे उन को बुलाओ

तुम्हें सब कुछ अता रब ने किया है
बनाना चाहते जो कुछ बनाओ

बदन का ख़ून तक हो जाए शामिल
ग़ज़ल के हुस्न को इतना बढ़ाओ

— shampa andaliib

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