मसरूफ़ अपने आप में रहता है हर घड़ी
दिल ये हमारा और की सुनता नहीं कभी
पहरों यही मैं बैठ के बस देखती रही
क्या कुछ बयान करती है इक ट्रेन दौड़ती
ख़्वाहिश थी आसमाँ से ज़मीं देखती मगर
इक लड़की एक घर की रसोई में रह गई
अफ़सोस वो दरख़्त भी इक दम से गिर गया
महफ़ूज़ जिस के साए में मैं हर घड़ी रही
दुनिया समझ रही है इसी को प अस्ल में
पिंजरे में 'उम्र कट रही है ‘अंदलीब’ की
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