दस्त-ए-ज़रूरियात में बटता चला गया

  - Shaukat Fehmi

दस्त-ए-ज़रूरियात में बटता चला गया
मैं बे-पनाह शख़्स था घटता चला गया

पीछे हटा मैं रास्ता देने के वास्ते
फिर यूँ हुआ कि राह से हटता चला गया

उजलत थी इस क़दर कि मैं कुछ भी पढ़े बग़ैर
औराक़ ज़िंदगी के पलटता चला गया

जितनी ज़ियादा आगही बढ़ती गई मिरी
उतना दरून-ए-ज़ात सिमटता चला गया

कुछ धूप ज़िंदगी की भी बढ़ती चली गई
और कुछ ख़याल-ए-यार भी छटता चला गया

उजड़े हुए मकान में कल शब तिरा ख़याल
आसेब बन के मुझ से लिपटता चला गया

उस से त'अल्लुक़ात बढ़ाने की चाह में
'फ़हमी' मैं अपने-आप से कटता चला गया

  - Shaukat Fehmi

More by Shaukat Fehmi

As you were reading Shayari by Shaukat Fehmi

    आख़िरी बस है और निकलने वाली है
    आ जाओ इक सीट बराबर खाली है
    Shaukat Fehmi
    23 Likes
    इस तरह के हरीफ़-ए-सख़्त के साथ
    कौन लड़ता है अपने बख़्त के साथ

    देखिये क्या हमें गवारा हो
    एक तख़्ता धरा है तख़्त के साथ

    वो ज़रूरत थी या मुहब्बत थी
    बेल लिपटी रही दरख़्त के साथ
    Read Full
    Shaukat Fehmi
    वो एक शख़्स किसी तौर जो मेरा न हुआ
    मेरी बला से किसी का अगर हुआ न हुआ

    मुझे फ़िराक़ ने घेरा तेरे विसाल के बीच
    मैं एक मचान पे बैठे हुए निशाना हुआ

    इसीलिए मेरे रस्ते में शाम आई है
    मैं अपनी सम्त बड़ी देर से रवाना हुआ
    Read Full
    Shaukat Fehmi
    बदला जो वक़्त गहरी रफ़ाक़त बदल गई
    सूरज ढला तो साए की सूरत बदल गई

    इक उम्र तक मैं उसकी ज़रूरत बना रहा
    फिर यूँ हुआ कि उसकी ज़रूरत बदल गई
    Read Full
    Shaukat Fehmi
    28 Likes
    देता नहीं था छाँव मगर रख लिया गया
    ईंधन बनेगा बूढ़ा शजर रख लिया गया

    आँखों में उम्र भर की मसाफ़त समेट कर
    घर जा रहा हूँ मुझको अगर रख लिया गया

    मुझको थमा दिया गया क़िस्मत का फ़ैसला
    और मेरी मेहनतों का समर रख लिया गया
    Read Full
    Shaukat Fehmi

Similar Writers

our suggestion based on Shaukat Fehmi

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari