अजनबी धुन में रची अपनी ही सरगम सी थी
ज़िन्दगी डोर थी और डोर वो रेशम सी थी
मुझको ये ग़म नहीं के मुझको ख़ुशी मिल न सकी
पर तअ'ज्जुब तो है क्यूँँ मेरी ख़ुशी ग़म सी थी
उसका इक दिल ही तो बस मेरा न हो पाया था
हाँ वो मेरी थी मगर पूरे से कुछ कम सी थी
उसके पाज़ेब की झंकार सा रोना उसका
उसके हर आँसू की आवाज़ तो छमछम सी थी
इक कमी ज़्यादा थी हम में सो हमें लगता था
वो कमी हम में नहीं वो कमी तो हम सी थी
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