ajnabi dhun men rachi apni hi sargam si thii | अजनबी धुन में रची अपनी ही सरगम सी थी

  - Shivang Tiwari

अजनबी धुन में रची अपनी ही सरगम सी थी
ज़िन्दगी डोर थी और डोर वो रेशम सी थी

मुझको ये ग़म नहीं के मुझको ख़ुशी मिल न सकी
पर तअ'ज्जुब तो है क्यूँँ मेरी ख़ुशी ग़म सी थी

उसका इक दिल ही तो बस मेरा न हो पाया था
हाँ वो मेरी थी मगर पूरे से कुछ कम सी थी

उसके पाज़ेब की झंकार सा रोना उसका
उसके हर आँसू की आवाज़ तो छमछम सी थी

इक कमी ज़्यादा थी हम में सो हमें लगता था
वो कमी हम में नहीं वो कमी तो हम सी थी

  - Shivang Tiwari

Awaaz Shayari

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