काश कभी मैं मर जाऊँ
तुम को पागल कर जाऊँ
बैठ गया फिर रस्ते में
जब ये सोचा घर जाऊँ
सोच रहा मरने के बाद
जाने कौन नगर जाऊँ
अपनों ने धुतकारा है
शायद आज सुधर जाऊँ
सन्नाटा है बस उस सम्त
अपनी ओर अगर जाऊँ
ख़ुद को इतना भूल चुका
देख भी लूँ तो मुकर जाऊँ
दिल में उतरने वालों के
दिल से आज उतर जाऊँ
उस तितली के हर जानिब
ख़ुशबू बन के बिखर जाऊँ
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