kabhi zabaan khulii nahin kabhi qalam chala nahin | कभी ज़बाँ खुली नहीं कभी क़लम चला नहीं

  - Sohil Barelvi

कभी ज़बाँ खुली नहीं कभी क़लम चला नहीं
वो टीस ज़ख़्म बन गई जिसे कभी कहा नहीं

बिछड़ गए उजड़ गए कई बरस गुज़र गए
मिरा भी कुछ पता नहीं तिरा भी कुछ पता नहीं

तुम्हें अगर है बोलना तो बोलते रहो मगर
कभी भी झूठ सच के दरमियान में टिका नहीं

तिरी नवाजिशों में सिर्फ़ झूठ है फ़रेब है
मिरा 'अज़ाब बढ़ गया कि दुख मिरा घटा नहीं

कभी अगर मुकर गया तो किस के दर पे जाओगे
सनम को बस सनम कहो सनम कोई ख़ुदा नहीं

अजीब हादसा हुआ अजीब दुख मिला मुझे
किसी का मैं तो हो गया मिरा कोई हुआ नहीं

अज़ीज़ थे हबीब थे जो दिल के कुछ क़रीब थे
वो ऐसा ज़ख़्म दे गए जो वक़्त से भरा नहीं

जो हादसे मैं सह गया यक़ीं नहीं करोगे तुम
किसी तरह से बच गया किसी तरह मरा नहीं

मुसीबतें पड़ीं तो अब पुकारते हैं दम-ब-दम
जो लोग कह रहे थे कल कहीं पे अब ख़ुदा नहीं

मुआफ़ कर दिया सभी को दिल ही दिल में एक दिन
किसी से कुछ कहा नहीं पर और दुख सहा नहीं

  - Sohil Barelvi

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