कभी ज़बाँ खुली नहीं कभी क़लम चला नहीं
वो टीस ज़ख़्म बन गई जिसे कभी कहा नहीं
बिछड़ गए उजड़ गए कई बरस गुज़र गए
मिरा भी कुछ पता नहीं तिरा भी कुछ पता नहीं
तुम्हें अगर है बोलना तो बोलते रहो मगर
कभी भी झूठ सच के दरमियान में टिका नहीं
तिरी नवाजिशों में सिर्फ़ झूठ है फ़रेब है
मिरा 'अज़ाब बढ़ गया कि दुख मिरा घटा नहीं
कभी अगर मुकर गया तो किस के दर पे जाओगे
सनम को बस सनम कहो सनम कोई ख़ुदा नहीं
अजीब हादसा हुआ अजीब दुख मिला मुझे
किसी का मैं तो हो गया मिरा कोई हुआ नहीं
अज़ीज़ थे हबीब थे जो दिल के कुछ क़रीब थे
वो ऐसा ज़ख़्म दे गए जो वक़्त से भरा नहीं
जो हादसे मैं सह गया यक़ीं नहीं करोगे तुम
किसी तरह से बच गया किसी तरह मरा नहीं
मुसीबतें पड़ीं तो अब पुकारते हैं दम-ब-दम
जो लोग कह रहे थे कल कहीं पे अब ख़ुदा नहीं
मुआफ़ कर दिया सभी को दिल ही दिल में एक दिन
किसी से कुछ कहा नहीं पर और दुख सहा नहीं
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