क्यूँँ नहीं आए ये मेरे सर में
ज़ख़्म भरते नहीं दिसंबर में
ग़ौर से देख लूटने वाले
और कुछ तो नहीं बचा घर में
वक़्त-ए-आख़िर लगा दिया मैंने
ज़ोर जितना भी था मिरे पर में
इक तो दुनिया ख़िलाफ़ है मेरे
और तू भी नहीं मुक़द्दर में
क्या पता कब इधर ख़िज़ाँ आई
मैं तो खोया रहा गुल-ए-तर में
जिस्म बाहर पड़ा रहा और मैं
डूब कर मर गया समुंदर में
तैश में आ गए मियाँ 'सोहिल'
और फिर कुछ नहीं बचा घर में
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