तुम तो बिछड़ते वक़्त भी पैरों पे घर गए
हम ठहरे नातवाँ वहीं दम-भर में मर गए
वो आए कब क़रीब हमारे ये देखिए
हम इस जहान-ए-फ़ानी से जब कूच कर गए
आह-ओ-फ़ुगाँ के बाद मिला चैन जब हमें
कूचा-ए-यार छोड़ के हम अपने घर गए
हैरान हूँ बदलते हुए शहर देख कर
गलियाँ कहाँ वो सारी वो रस्ते किधर गए
खुलते ही आँख मेरी ही तस्वीर देखना
ऐसा किए तुम्हें तो ज़माने गुज़र गए
उजलत में एक ने ली चराग़ों से दुश्मनी
उजलत में यार देखिए कितनों के घर गए
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