क्या क्या और नज़र-अंदाज़ करूँँगा मैं
कितने पत्थर दिल पर और रखूँगा मैं
कूज़ागर की मेहनत काम आ जाएगी
एक न इक दिन कुछ तो यार बनूँगा मैं
एक न इक दिन तू भी मुझ को समझेगा
देखना इक दिन दिल की बात कहूँगा मैं
तू जिस भीड़ में मुझ को ढूँढ रहा है अब
सब से हटके थोड़ी दूर मिलूँगा मैं
इतने रस्तों से अब वाक़िफ़ हूँ यारों
मंज़िल पालूँगा जिस ओर चलूँगा मैं
सब के मन की कर के सुन के पछताया
अब के अपने दिल की यार सुनूँगा मैं
जिस दिन तेरे काम नहीं आ पाऊँगा
उस दिन तेरे दिल को बहुत चुभूँगा मैं
मुझ से सोहिल जिस जिस ने मुँह मोड़ा है
सब से इक दिन खुल कर यार मिलूँगा मैं
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