तेरे हिस्से की तीरगी मुझ को
आख़िरश देख ले मिली मुझ को
मैं अकेला नहीं हूँ कमरे में
तेरी तस्वीर तक रही मुझ को
रात के तीन चार बजने पर
आज कल नींद आ रही मुझ को
रोज़ मैं तीरगी से लड़ता था
आज हासिल है रौशनी मुझ को
सैकड़ों बुत बना दिए रब ने
तेरी सूरत लगी भली मुझ को
क्यूँँ समझता नहीं है चारागर
भूख लगती है इक घड़ी मुझ को
मैं भी हँसता था भूल जाऊँगा
इतना चाहेगी ख़ामुशी मुझ को
मैं ने दुनिया को ख़ूब जाना है
काश दुनिया भी जानती मुझ को
Read Full