tere hisse ki teergii mujh ko | तेरे हिस्से की तीरगी मुझ को

  - Sohil Barelvi

तेरे हिस्से की तीरगी मुझ को
आख़िरश देख ले मिली मुझ को

मैं अकेला नहीं हूँ कमरे में
तेरी तस्वीर तक रही मुझ को

रात के तीन चार बजने पर
आज कल नींद आ रही मुझ को

रोज़ मैं तीरगी से लड़ता था
आज हासिल है रौशनी मुझ को

सैकड़ों बुत बना दिए रब ने
तेरी सूरत लगी भली मुझ को

क्यूँँ समझता नहीं है चारागर
भूख लगती है इक घड़ी मुझ को

मैं भी हँसता था भूल जाऊँगा
इतना चाहेगी ख़ामुशी मुझ को

मैं ने दुनिया को ख़ूब जाना है
काश दुनिया भी जानती मुझ को

  - Sohil Barelvi

Raat Shayari

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