galat baaton ko khaamoshi se sunna haami bhar lena | ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना

  - Javed Akhtar

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

  - Javed Akhtar

Bahana Shayari

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    तकल्लुफ़ छोड़कर आओ उसे फिर से जिया जाए
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    क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
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    कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए
    क्या समाई थी भला दीवाने के सर देखिए
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    एक ये दिन जब अपनों ने भी हम से नाता तोड़ लिया
    एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं

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    एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
    एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं

    एक ये दिन जब ज़ेहन में सारी अय्यारी की बातें हैं
    एक वो दिन जब दिल में भोली-भाली बातें रहती थीं

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    जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
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    इक पल ग़मों का दरिया, इक पल ख़ुशी का दरिया
    रूकता नहीं कभी भी, ये ज़िन्‍दगी का दरिया

    आँखें थीं वो किसी की, या ख़्वाब की ज़ंजीरें
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    इस दिल की वादियों में, अब खाक उड़ रही है
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    दरिया की चाँदनी है, या चाँदनी का दरिया
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    निगल गए सब की सब समुंदर ज़मीं बची अब कहीं नहीं है
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    बहुत दिनों बा'द पाई फ़ुर्सत तो मैं ने ख़ुद को पलट के देखा
    मगर मैं पहचानता था जिस को वो आदमी अब कहीं नहीं है

    गुज़र गया वक़्त दिल पे लिख कर न जाने कैसी अजीब बातें
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    तुम अपने क़स्बों में जा के देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं
    कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है
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