अपना मतलब निकालने वाले
मेरी तकलीफ़ से हैं बेगाने
इस दफ़ा क्यूँँ दिलासा देने लगे
ज़ख़्म पर फिर नमक छिड़क देते
हाए वो इंतिज़ार की घड़ियाँ
आँख अटकी रही दरीचे से
मुझ को हैरत में डाल देते हैं
मुझ को हैरत से देखने वाले
आँख में रौशनी अगर बचती
तेरी तस्वीर देख ही लेते
तुम अगर देखते पलट कर तो
दौड़ कर ट्रेन को पकड़ लेते
ख़ुद को पहचानना पड़ा भारी
ख़ुद को भूले हैं आपसे मिल के
ख़ैर इतना तो कर ही सकता हूँ
जान दे दूँगा अश्क के बदले
आज के दौर में मियाँ सोहिल
लोग मिलते हैं दिल नहीं मिलते
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