चराग़ हँस लें ये मौक़ा' ज़रा नहीं देती
घुटन हवाओं को भी रास्ता नहीं देती
तिरे बग़ैर भी कहती है मुझ से जीने को
ये ज़िंदगी भी सही मशवरा नहीं देती
हम ऐसे शहर में रहते हैं दोस्तो कि जहाँ
कोई ज़बान किसी को दुआ नहीं देती
उदासियों का मिरे दोस्त ऐसा 'आलम है
कि तेरी याद भी अब हौसला नहीं देती
तुम्हारा ज़िक्र ही हर बार छेड़ देती है
ये दुनिया ज़ख़्म भी कोई नया नहीं देती
— Waseem Nadir















