ज़िन्दगी में इश्क़ का अधूरापन भी झूठा है
मेहबूब के ना होने का सूनापन भी झूठा है
गर जो हो जाता है भूले से भी दीदार उसका
उसे देख लेने का उतावलापन भी झूठा है
महफ़िल में भी खोए रहते हो उसकी यादों में
यार की यादों का ये अकेलापन भी झूठा है
मोहब्बत की खातिर कैसे पागल से फिरते हैं
ये आशिकों के प्यार का आवारापन भी झूठा है
कुछ मजबूरियां रहीं होंगी उसकी जो चला गया
उससे नफ़रत करने का ये दिखावापन भी झूठा है
कभी जो फुर्सत मिले तो ख़ुद से भी मिल लेना
समझ जाओगे "निहार", ये दीवानापन भी झूठा है
लबों पर हंसी है तो दिल में ये कैसी चुभन है
अरे ये मोहब्बत भी दोस्तों इक अजीब फ़न है
रूह से रूह का इश्क़ कहां मिलता है अब "निहार"
आजकल जिस्मानी इश्क़ का ही दौर ए चलन है
अब जो हम हर बात पर मुस्कुराते हैं
ना जाने कितना दर्द है जिसे छिपाते हैं
कोई है इस कदर अजीज हमे कि मत पूछो
और वही मेरे किरदार पर उंगलियां उठाते हैं
जिन्हे अपना समझ बैठे थे वो हाल तक नहीं पूछते
और कई बेगाने हैं जो अब भी साथ निभाते हैं
कुछ पुराने लम्हें जो लबों पर मुस्कान लाते थे
अब बार बार याद आकर हमे रुलाते हैं
जिसकी खुशी की दुआ में उठते हैं हमारे हाथ
वो नफ़रत की आग में क्यों ख़ुद को जलाते हैं
हमे मालूम है मौजें सब कुछ बहा कर ले जाएंगी "निहार"
फिर भी आशियां रेत का साहिल पर ही बनाते हैं
ज़िन्दगी के सफ़र में ख़ुशी और ग़म का अपना अपना किस्सा है
अच्छा नहीं तो बुरा ही सही, पर वो शख़्स मेरी कहानी का हिस्सा है
इक रोज़ हमारे बिखरते रिश्ते का राज़ खोल दिया उसने
इल्ज़ाम मुझपे डाल कर, जुदा होने को बोल दिया उसने
उससे मोहब्बत इतनी कि खामोशी से सुनता रहा तोहमतें
बड़ी बेरुखी से "निहार" मेरी मोहब्बत को तोल दिया उसने
तुम जो अब लौट आओ तो कुछ बात बने
दिल से दिल का हाल बताओ तो कुछ बात बने
बहुत तन्हा कट रहा है ये ज़िन्दगी का सफ़र
मेरे कदम से कदम मिलाओ तो कुछ बात बने
मेरे हिस्से में नहीं कुछ फकत अंधेरे के सिवा
तुम जो इक दिया जलाओ तो कुछ बात बने
मेरे ही ख़्वाबों के टुकड़े आंखों में चुभने लगे हैं
तुम कोई नया ख्वाब दिखाओ तो कुछ बात बने
इंसां के घरों के दरवाजों ने परिंदो को बेघर कर दिया
"निहार" हर रोज इक पौधा लगाओ तो कुछ बात बने
कभी नज़रों में तल्खी तो कभी इशारों की नज़ाकत
काट दे तेरे इशारों को, कौन करेगा ऐसी हिमाकत
यूँ खामोश बैठे किस उलझन में हो
इंकार है या इकरार है बता दो हमे
मोहब्बत हमने की है तुमसे
गर इश्क़ ख़ता है तो सज़ा दो हमे
मरता नहीं इस जहां में कोई किसी के बगैर
गर ज़िंदा हो तो इत्तिला दो हमे
सुना है हमारे ख़तों को जला दिए तुमने
गर जला सको तो जला दो हमे
ये जो दुनिया इश्क़ के खिलाफ है, कहाँ है?
ऐलान-ए-जंग करनी है , कोई पता दो हमे
लड़ाई मुश्किल है तो क्या, हौसले बुलंद हैं
बात आजमाइश की है तो आज़मा लो हमे
मंज़िलें मिलती नहीं फ़क़त ख़्वाब देखने से
पाँव के छाले गवाह है सफ़र-ए-मंज़िल के
खफा हम किसी से नहीं बस जरा वक़्त की कमी है
आसमान में उड़ने का ख्वाब है और पैरों तले जमीं है