ज़िन्दगी में इश्क़ का अधूरापन भी झूठा है
मेहबूब के ना होने का सूनापन भी झूठा है
गर जो हो जाता है भूले से भी दीदार उस का
उसे देख लेने का उतावलापन भी झूठा है
महफ़िल में भी खोए रहते हो उस की यादों में
यार की यादों का ये अकेलापन भी झूठा है
मोहब्बत की ख़ातिर कैसे पागल से फिरते हैं
ये आशिकों के प्यार का आवारापन भी झूठा है
कुछ मजबूरियाँ रहीं होंगी उस की जो चला गया
उस से नफ़रत करने का ये दिखावापन भी झूठा है
कभी जो फ़ुर्सत मिले तो ख़ुद से भी मिल लेना
समझ जाओगे "निहार", ये दीवानापन भी झूठा है
— Shashank Tripathi















