ज़िन्दगी में 'इश्क़ का अधूरापन भी झूठा है
मेहबूब के ना होने का सूनापन भी झूठा है
गर जो हो जाता है भूले से भी दीदार उसका
उसे देख लेने का उतावलापन भी झूठा है
महफ़िल में भी खोए रहते हो उसकी यादों में
यार की यादों का ये अकेलापन भी झूठा है
मोहब्बत की खातिर कैसे पागल से फिरते हैं
ये आशिकों के प्यार का आवारापन भी झूठा है
कुछ मजबूरियां रहीं होंगी उसकी जो चला गया
उस सेे नफ़रत करने का ये दिखावापन भी झूठा है
कभी जो फुर्सत मिले तो ख़ुद से भी मिल लेना
समझ जाओगे "निहार", ये दीवानापन भी झूठा है
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