कभी जिस की गज़ाल सी आँखों में अपना घर देखा था
यूँ ही हाथों में हाथ था
में चलते हुए उस का शहर देख था
रंग बहारों में बिखेरती तितलियां खूब देखीं हैं सभी ने
मौसम ए खिज़ा में फूल बटोरता इक हम सफ़र देखा था
थे खबरबास्ता कि उसे पाना नहीं है मुमकिन मगर
उसे मंज़िल बना कर एक ख़ूब-सूरत सफ़र देखा था
अब नहीं देता वो पहले की तरह मीठे फल मुसाफ़िर को
कभी जो अपनी शाख़ फैलाए इक प्यार का शज़र देखा था
सफ़र पर चल दिए तो अकेले होने का क्या ग़म है "निहार"
कभी फूलों से तो कभी काँटों से सजा इक रहगुज़र देखा था
— Shashank Tripathi















