कभी जिसकी गज़ाल सी आँखों में अपना घर देखा था
यूँँं ही हाथों में हाथ था
में चलते हुए उसका शहर देख था
रंग बहारों में बिखेरती तितलियां खूब देखीं हैं सभी ने
मौसम ए खिज़ा में फूल बटोरता इक हम सेफ़र देखा था
थे खबरबास्ता कि उसे पाना नहीं है मुमकिन मगर
उसे मंज़िल बनाकर एक खूबसूरत सफर देखा था
अब नहीं देता वो पहले की तरह मीठे फल मुसाफ़िर को
कभी जो अपनी शाख़ फैलाए इक प्यार का शज़र देखा था
सफर पर चल दिए तो अकेले होने का क्या ग़म है "निहार"
कभी फूलों से तो कभी कांटों से सजा इक रहगुज़र देखा था
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