यूँ मायूसी के सांचे में ना ख़ुद को ढालिए
दोस्तों के साथ बैठ कर ग़मों को निकालिए
खिले थे फूल कितने बाहर-ए-चमन में मगर
जुनून-ए-इश्क़ में तो आपने काँटे उठा लिए
अब जो यारों की महफ़िल है तो ज़ाम भी होंगे
अभी अपने क़दमों को ज़रा बहकने से संभालिए
कितने बेमुरव्वत होंगे वो लोग जो उस का नाम लेंगे
अपनी बर्बादी के लिए अपना ही नाम उछालिए
गर जो बाकी हो अभी भी उम्मीद-ए-वफ़ा कहीं
मेरी मानिए तो जनाब आप इक कुत्ता पालिए
नहीं मिलेगा सुकून इस मतलबी दुनिया से आप को
अपनी ख़ुशियों को "निहार" अपने अंदर ही खंगालिए
— Shashank Tripathi















