मेरे साथ आओ कि ज़िन्दगी की कुछ बात करें
अंजान बनकर सफ़र की इक नई शुरुआत करें
ना जाने क्यूँ सिर्फ़ ग़मों को ही लिखता रहा मैं
ख़ैर छोड़ो, खुशनुमा अब ये सफ़र-ए-हयात करें
सुनो, बहुत गहरा घाव करती हैं ये लचीली ज़बान
दोस्तों, लफ़्ज़ों के चुनाव में थोड़ा एहतियात करें
कितना ख़ूब-सूरत होगा वो नज़ारा भी "निहार"
आओ चाँद तारों के छांव में बसर ये रात करें
— Shashank Tripathi















