Yasir Khan

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    हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए
    इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए

    हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है
    तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए

    तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से
    है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए

    है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ
    हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
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    इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है
    यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है

    इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का
    वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है

    मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता
    रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है

    हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी
    अब बदलते हुए हालात से डर लगता है

    दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर'
    घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है
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    जिनको मालूम नहीं होगा दुआ का मतलब
    वो हमें ख़ाक बताएँगे ख़ुदा का मतलब

    वो ये कहते हैं मोहब्बत में सज़ा पाओगे
    और मैं ख़ूब समझता हूँ सज़ा का मतलब

    यानी काँटों से मैं ख़ुशबू के मआनी पूछूँ
    यानी अब आप बताएँगे वफ़ा का मतलब
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    ज़िंदगी भर वो उदासी के लिए काफ़ी है
    एक तस्वीर जो हँसते हुए खिंचवाई थी
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    ज़मीं बनाई गई आसमाँ बनाया गया
    बराए-इश्क़ ये सारा जहाँ बनाया गया

    तुम्हारी ना को ही आख़िर में हाँ बनाया गया
    यक़ीं के चाक पे रख कर गुमाँ बनाया गया

    तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी
    कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया

    हमारे साथ कोई दो क़दम भी चल न सका
    किसी के वास्ते इक कारवाँ बनाया गया

    बदल के देख लो तुम जिस्म चाहे औरों से
    वहीं पे ठीक है जिस को जहाँ बनाया गया

    किसी को जब भी ज़रूरत पड़ी सियाही की
    हमारा जिस्म जला कर धुआँ बनाया गया

    बस एक मैं ही था बस्ती में बोलने वाला
    तो सब से पहले मुझे बे-ज़बाँ बनाया गया
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    तुम्हारे काम अगर आए मुस्कुराने में
    तो कोई हर्ज नहीं मेरे टूट जाने में

    फ़रोख़्त हो गई हर शय जो दिल मकान में थी
    मैं इतना ख़र्च हुआ हूँ उसे कमाने में

    मैं अपनी जान से जाऊँगा है ये सच लेकिन
    उसे भी ज़ख़्म तो आएँगे आज़माने में

    वो एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत न बिन सका मुझ से
    हज़ार बार मिटा हूँ जिसे बनाने में

    तुम्हें तो सिर्फ़ ख़बर है चराग़ जलने की
    हमारे हाथ जले हैं उसे जलाने में

    तुम्हारे वस्ल की मस्ती थी और मय-ख़ाना
    शराब ले के गया था शराब-ख़ाने में

    इमारतों में मोहब्बत का देवता है वो
    हमारे हाथ कटे हैं जिसे बनाने में
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    किसी ने हाल जो पूछा कभी मोहब्बत से
    लिपट के रोया बहुत देर उस से शिद्दत से

    हमारा साथ जो छूटा तो इस में हैरत क्या
    हमारे हाथ तो छूटे हुए थे मुद्दत से

    ये और बात कि बीनाई जा चुकी मेरी
    तुम्हारे ख़्वाब रखे हैं मगर हिफ़ाज़त से

    जब उस ने भीड़ में मुझ को गले लगाया था
    हर एक आँख मुझे तक रही थी हैरत से

    ये कारोबार-ए-सियासत बहुत ही अच्छा है
    बस आप झूट को बेचो बड़ी सदाक़त से
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    बना हुआ था कहीं आब-दान काग़ज़ पर
    थी इतनी प्यास कि रख दी ज़बान काग़ज़ पर

    किराएदार की आँखों में आ गए आँसू
    बनाए बैठे थे बच्चे मकान काग़ज़ पर

    तुम्हारे ख़त में नज़र आई इतनी ख़ामोशी
    कि मुझ को रखने पड़े अपने कान काग़ज़ पर

    तमाम उम्र गुज़ारी है धूप में शायद
    बना रहा है कोई साएबान काग़ज़ पर

    उठा लिया है क़लम अब तो मैं ने भी 'यासिर'
    उतार डालूँगा सारी थकान काग़ज़ पर
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    मिरी चीख़ों से कमरा भर गया था
    कोई कल रात मुझ में मर गया था

    बहुत मुश्किल है उस का लौट आना
    वो पूरी बात कब सुन कर गया था

    मुझे पहचानता भी है कोई अब
    मैं बस ये देखने ही घर गया था

    ज़माना जिस को दरिया कह रहा है
    हमारी आँख से बह कर गया था

    कई सदियों से सूखा पड़ रहा है
    यहाँ इक शख़्स प्यासा मर गया था

    हमारा बोझ था सर पर हमारे
    तुम्हारे साथ तो नौकर गया था

    ये मत समझा ख़ता किस से हुई थी
    बता इल्ज़ाम किस के सर गया था
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    आँखों को कुछ ख़्वाब दिखा कर मानेंगे
    आप हमारे होश उड़ा कर मानेंगे

    लगता है ये पानी बेचने वाले लोग
    हर बस्ती में आग लगा कर मानेंगे

    तुझ को छूने की चाहत में दीवाने
    शायद अपने हाथ जला कर मानेंगे

    तय तो ये था पिछली बातें भूलनी हैं
    आप मगर सब याद दिला कर मानेंगे

    घर का झगड़ा गर बाहर आ जाएगा
    बाहर वाले अंदर आ कर मानेंगे

    चाहे फिर आवाज़ चली जाए लेकिन
    हम उस को आवाज़ लगा कर मानेंगे

    घर पक्का करने की बातें करते हैं
    या'नी वो दीवार उठा कर मानेंगे
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    Yasir Khan
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