ख़ूँ के आँसू मुझे रुलाती है
जब कभी याद तेरी आती है
तेरी फ़ुर्क़त में हमने जाना है
कि घड़ी शोर क्यूँ मचाती है
एक बच्चे ने क़ब्र पे लिक्खा
माँ ये दुनिया बड़ा सताती है
रोज़ सूरज ग़ुरूब होते ही
जिस्म में रूह छटपटाती है
दिल जो टूटा तो फिर समझ आया
काँच की चीज़ टूट जाती है
जब भी बढ़ता हूँ मंज़िलों की तरफ़
बद्दुआ उसकी मुस्कुराती है
शाम होते ही रोज़ तन्हाई
दिल के कोने में बैठ जाती है
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