हम ख़्वाब देख लें किसी ता'बीर के बग़ैर
हम ने लड़ी है जंग भी शमशीर के बग़ैर
लाऊँ कहाँ से काट के अपने नसों कि ख़ूँ
काटे हैं अपने हाथ तो तदबीर के बग़ैर
बातें बड़ी बड़ी कीं मगर चाल भी चले
राँझा भी क्या करेगा यहाँ हीर के बग़ैर
कैसी ग़ज़ल लिखी है तरन्नुम में कुछ नहीं
लिखना कभी हुआ ही नहीं मीर के बग़ैर
ये सब अगर था करना तो आ सामने ज़रा
देना है मुझ को ज़हर तो दे खीर के बग़ैर
कैसा मुरीद है कि इसे कुछ ख़बर नहीं
जानी नहीं मुरीद कोई पीर के बग़ैर
— Arohi Tripathi















