रात में जब भी ख़्वाब देखेगा
बा-ख़ुदा ला-जवाब देखेगा
उस की ख़्वाहिश थी हुस्न को देखे
ज़लवा-ए-आफ़ताब देखेगा
मैं ने इस ख़ौफ़ में नहीं छोड़ा
क्या ख़बर क्या अज़ाब देखेगा
जिस की ख़ातिर हमें गया छोड़ा
उस को भी बे-नक़ाब देखेगा
देखना रो पड़ेगा वो लड़का
इश्क़ का जब हिसाब देखेगा
तब उसे हो यक़ीं मोहब्बत पे
क़ब्र में जब जनाब देखेगा
शर्म से सर झुकाए होगा वो
जब कफ़न का हिजाब देखेगा
वो हमारे बग़ैर ही मुर्शिद
क्या ही अच्छा ख़राब देखेगा
— Arohi Tripathi















