आपका इस
में कुछ क़ुसूर नहीं
छोड़िए बात सब हुज़ूर नहीं
हम वफ़ा की अना में रहते थे
या-ख़ुदा 'इश्क़ पे ग़ुरूर नहीं
आप सिखलाइए मोहब्बत को
हमको उस्ताद कुछ शुऊर नहीं
दिल कि जिस पर है नक़्श अक्स तिरा
अब तो ख़्वाबों में भी ज़ुहूर नहीं
झूठ बोले वो अब सलीक़े से
तीरगी बात में है नूर नहीं
झूठ मत बोल ये नहीं जन्नत
और उस पे कि तू भी हूर नहीं
साथ मेरे फ़रेब कैसा है
सच बता दे ये कोह-ए-तूर नहीं
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