दुश्मनों के लिए दुआ की थी
अपने ग़म की यही दवा की थी
ग़म में हँसना ख़ुशी में रो देना
ज़िन्दगी अपनी यूँ फ़ना की थी
जो सज़ा मिल रही ज़माने से
हम ने उतनी नहीं ख़ता की थी
ख़्वाब ख़ुशियों के देखते रहना
दर्द की हम ने यूँ दवा की थी
दर्द सीने में पाल कर हम ने
शा'इरी की यूँ इब्तिदा की थी
हम ने मंज़िल की जुस्तजू कर के
ज़िन्दगी अपनी ख़ुशनुमा की थी
सुख का एहसास वो 'धरम' कैसा
जब किसी के लिए दुआ की थी
— Dharamraj deshraj















