तुझ को पाकर मैं खो नहीं सकता
जन्म भर ऐसा हो नहीं सकता
मेरी गै़रत ने रोक रक्खा है
ख़ुद को ग़म में डुबो नहीं सकता
बेवफ़ाई का दाग़ मत देना
आँसुओ से भी धो नहीं सकता
वा'दा हँसने का कर चुका आख़िर
चाह कर भी मैं रो नहीं सकता
है क़लम हल, ज़मीन काग़ज़ की
अपने आँसू भी बो नहीं सकता
अश्क मोती हैं मत करो ज़ाया'
ऐसे मोती पिरो नहीं सकता
मौत कब वस्ल को 'धरम' आए
बेख़बर हो के सो नहीं सकता
— Dharamraj deshraj















