हक़ मुहब्बत का आख़िर अदा कर दिया
आँख से अश्क हम ने रिहा कर दिया
उन की नज़रों से नज़रें मिलीं तो लगा
आईने की तरफ़ आईना कर दिया
ख़्वाब में दे के बोसे हज़ारों मुझे
ज़िन्दगी का मज़ा सौ गुना कर दिया
उस को इंसान मैं किस तरह से कहूँ
जिस ने ईमान ही लापता कर दिया
ग़म की सौग़ात लेने से कर के मना
अपने दुश्मन को मैं ने खफ़ा कर दिया
ख़्वाब उस ने ख़ुशी का दिखा कर हमें
दिल के ज़ख़्मों को फिर से हरा कर दिया
उन के हँसने पे मैं रो पड़ा बे-सबब
सोचता हूँ "धरम" मैं ने क्या कर दिया
— Dharamraj deshraj















