Qamar Moradabadi

Qamar Moradabadi

@qamar-moradabadi

Qamar Moradabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qamar Moradabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है — Qamar Moradabadi

Ghazal

नज़र है जल्वा-ए-जानाँ है देखिए क्या हो शिकस्त-ए-इश्क़ का इम्काँ है देखिए क्या हो अभी बहार-ए-गुज़िश्ता का ग़म मिटा भी नहीं फिर एहतिमाम-ए-बहाराँ है देखिए क्या हो क़दम उठे भी नहीं बज़्म-ए-नाज़ की जानिब ख़याल अभी से परेशाँ है देखिए क्या हो किसी की राह में काँटे किसी की राह में फूल हमारी राह में तूफ़ाँ है देखिए क्या हो ख़िरद का ज़ोर है आराइश-ए-गुलिस्ताँ पर जुनूँ हरीफ़-ए-बहाराँ है देखिए क्या हो जिस एक शाख़ पे बुनियाद है नशेमन की वो एक शाख़ भी लर्ज़ां है देखिए क्या हो है आज बज़्म में फिर इज़्न-ए-आम साक़ी का 'क़मर' हुनूज़ मुसलमाँ है देखिए क्या हो — Qamar Moradabadi
बे-नक़ाब उन की जफ़ाओं को किया है मैं ने वक़्त के हाथ में आईना दिया है मैं ने ख़ून ख़ुद शौक़ ओ तमन्ना का किया है मैं ने अपनी तस्वीर को इक रंग दिया है मैं ने ये तो सच है कि नहीं अपने गरेबाँ की ख़बर तेरा दामन तो कई बार सिया है मैं ने रसन ओ दार की तक़दीर जगा दी जिस ने तेरी दुनिया में वो ऐलान किया है मैं ने हर्फ़ आने न दिया इश्क़ की ख़ुद्दारी पर काम नाकाम तमन्ना से लिया है मैं ने जब कभी उन की जफ़ाओं की शिकायत की है तजज़िया अपनी वफ़ा का भी किया है मैं ने मुद्दतों बा'द जो इस राह से गुज़रा हूँ 'क़मर' अहद-ए-रफ़्ता को बहुत याद किया है मैं ने — Qamar Moradabadi
तुम उसी को वज्ह-ए-तरब कहो हम उसी को बाइ'स-ए-ग़म कहें वही इक फ़साना-ए-इश्क़ है कभी तुम कहो कभी हम कहें कभी ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा करें कभी दास्तान-ए-अलम कहें बड़े ए'तिमाद से वो सुनें बड़े ए'तिमाद से हम कहें जिसे इंक़लाब न छू सका उसे तू ने ख़ुद ही मिटा दिया वही एक दिल का सनम-कदा जिसे आबरू-ए-हरम कहें वही दिल-ख़राश सी इक नज़र जो ब-क़द्र-ए-ज़ौक़ है नेश्तर उसे कोई तर्ज़-ए-सितम कहे हम अदा-ए-पुर्सिश-ए-ग़म कहें तुझे ये ख़बर नहीं साक़िया कि है मय-कशों का मक़ाम क्या ये उन्हीं की वुसअ'त-ए-क़ल्ब है कि ख़ुद अपने ज़र्फ़ को कम कहें हमा-आरज़ू हमा-बे-खु़दी हमा-बंदगी हमा-बे-कसी यही चंद लम्हों की ज़िंदगी इसे क्यूँँ न फ़ुर्सत-ए-ग़म कहें 'क़मर' इस से हम को ग़रज़ ही क्या है सभी से उस का मोआ'मला जो ख़ुदा कहें वो ख़ुदा कहें जो सनम कहें वो सनम कहें — Qamar Moradabadi
मेरी राहों में कई मरहले दुश्वार आए दैर आया हरम आया रसन-ओ-दार आए जल्वा-गाहों में अभी शम-ए-यक़ीं जलने दो क्या अजब है जो कोई तालिब-ए-दीदार आए महफ़िल-ए-नाज़ के आदाब हैं सब पर लाज़िम कोई दीवाना यहाँ आए कि होश्यार आए इश्क़ में वुसअ'त-ए-कौनैन से शाइस्ता गुज़र क्या ख़बर है कि कहाँ जल्वा-गह-ए-यार आए साज़-ए-हस्ती में वो सोज़-ए-अबदी पैदा कर दिल के टूटे हुए तारों से भी झंकार आए मौज-ओ-साहिल मह-ओ-अंजुम गुल-ओ-लाला देखे जब कहीं तुझ को न पाया तो सर-ए-दार आए लज़्ज़त-ए-दर्द नहीं सब के मुक़द्दर में 'क़मर' जिस के हिस्सा में भी ये दौलत-ए-बेदार आए — Qamar Moradabadi