जब मैं उन के मकान से निकला
आँख से ख़ूँ भी शान से निकला
दर्द-ए-दिल बढ़ गया मेरा हद से
जाने क्या-क्या ज़ुबान से निकला
मैंने कितने सितम उठाए हैं
रात-दिन इम्तिहान से निकला
हो गए उस के नूर के क़ायल
चाँद जब आसमान से निकला
रौशनाई बहुत ज़रूरी थी
ख़ून भी इत्मीनान से निकला
फिर कभी लौटकर नहीं आया
आदमी जब जहान से निकला
ख़ूँ मेरा अश्क़ में बदल के 'धरम"
शे'र बनकर दिवान से निकला
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