तज़ुर्बा ये हुआ है ज़िन्दगी में

न होता कोई अपना मुफ़लिसी में

ज़बाँ ज़ख़्मों को मेरे मिल गई है
उन्हें शामिल किया जब शा'इरी में

ग़ज़ब का दिल बनाया है ख़ुदा ने
छलक पड़ते हैं आँसू भी ख़ुशी में

ख़ुशी का एक लम्हा कीमती है
हज़ारों ग़म हैं लेकिन ज़िन्दगी में

बुरा हूँ मैं मुझे अच्छा कहा है
शराबी ने यक़ीनन बेख़ुदी में

मुझे हँसता हुआ देखा तो कहते वो
कोई तो बात है इस आदमी में

मेरे रब मुझ को ये तौफ़ीक़ दे दे
रहूँ हँसता सदा ग़म और ख़ुशी में

— Dharamraj deshraj

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Zakhm Shayari

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