मेरा दुश्मन मुझी को भूल गया

प्यार में दुश्मनी को भूल गया

आज के दौर की हक़ीक़त है
आदमी, आदमी को भूल गया

तुम को दिल में बिठा लिया जब से
मैं तुम्हारी कमी को भूल गया

ज़िन्दगी क्या है जब से जाना है
दर्द-ओ-ग़म और ख़ुशी को भूल गया

खाई जब से क़सम न पीने की
भूल से मयकशी को भूल गया

रब ने क्या कुछ नहीं दिया मुझ को
उस की दरिया दिली को भूल गया

यार दौलत ग़मों की दे मुझ को
क्या मिरी मुफ़लिसी को भूल गया

— Dharamraj deshraj

More by Dharamraj deshraj

Other ghazal from the same pen

See all from Dharamraj deshraj →

Intiqam Shayari

Shers of intiqam.

All Intiqam Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling