मेरा दुश्मन मुझी को भूल गया
प्यार में दुश्मनी को भूल गया
आज के दौर की हक़ीक़त है
आदमी, आदमी को भूल गया
तुमको दिल में बिठा लिया जब से
मैं तुम्हारी कमी को भूल गया
ज़िन्दगी क्या है जब से जाना है
दर्द-ओ-ग़म और ख़ुशी को भूल गया
खाई जब से क़सम न पीने की
भूल से मयकशी को भूल गया
रब ने क्या कुछ नहीं दिया मुझको
उसकी दरिया दिली को भूल गया
यार दौलत ग़मों की दे मुझको
क्या मिरी मुफ़लिसी को भूल गया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Dharamraj deshraj
our suggestion based on Dharamraj deshraj
As you were reading Zindagi Shayari Shayari