मुझ को ऐसे देख रहा हैरानी में
जैसे सूरज देख लिया पेशानी में
मैं भी उस को देख रहा हूँ कुछ ऐसे
जैसे सूरज डूब रहा हो पानी में
मुश्किल में मुस्कान रखी उन होंठों पर
कितना मुश्किल काम किया आसानी में
वहशीपन है इस दुनिया की निय्यत में
बच्चा-बच्चा चीख रहा वीरानी में
उस दिन पहली बार उदासी टकराई
जब इक पौधा टूट गया शैतानी में
— DEVANSH TIWARI















