किसी लड़की की बातों से हुआ था प्यार मुझको
सो चुप रहकर ही करना 'इश्क़ का इज़हार मुझको
रहेंगे मुझ सेे सारे लोग ख़ुश कैसे हो मुमकिन
तमन्ना छोड़ कर ये सीखना इनकार मुझको
किताबें जितनी भी दे दो उठा लूँगा पिताजी
ज़ियादा लग रहा उम्मीद का ये भार मुझको
ख़ुशी ये जीत पर रुकती नहीं इतनी मुक़म्मल
गले ऐसे लगी थी ये मुक़म्मल हार मुझको
मनी माया बनी ऐसी गिना ख़ुद को समझदार
पुकारे रूह ले जाओ समंदर पार मुझको
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